Puja

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के व्रत परिचय और उनका महत्व

Kartik maas ke vrat aur tyohar laxmi pujan: कार्तिक माह में हेमाद्रि स्नान, करवा चौथ, दशरथपूजा, दम्पत्यष्टमी, कृष्णैकादशी, रमा एकादशी, गोवत्सद्वादशी, देव उठनी एकादशी, यम-दीपदान, धनत्रयोदशी यानी धनतेरस, रूपचतुर्दशी यानी नरक चतुर्दशी, हनुमान जन्मोत्सव, दीपोत्सव यानी दिवाली, गोत्रिरात्र, यम पूजा आदि पूजा और व्रत आते हैं। जानिए सभी का महत्व

 

कार्तिक स्नान (हेमाद्रि)- धर्म

 

1. कार्तिक स्नान (हेमाद्रि) धर्म- कर्मादि की साधना के लिए स्नान करने की सदैव आवश्यकता होती है। इसके सिवा आरोग्य की अभिवृद्धि और उसकी रक्षा के लिए भी नित्य स्नान से कल्याण होता है। विशेषकर माघ, वैशाख और कार्तिक का नित्य स्नान अधिक महत्त्व का है।

 

मदन पारिजात में लिखा है कि-

‘कार्तिकं सकलं माझं नित्यस्नायी जितेन्द्रिय:। जपन् हविष्यभुक्छान्त: सर्वपापैः प्रमुच्यते।’

कार्तिक मास में जितेन्द्रिय रहकर नित्य स्नान करें और हविष्य (जौ, गेहूं, मूंग तथा दूध-दही और घी आदि) का एक बार भोजन करें तो सब पाप दूर हो जाते हैं।

 

इस व्रत को आश्विन की पूर्णिमा से प्रारम्भ करके 31वें दिन कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को समाप्त करें। इसमें स्नान के लिए घर के बर्तनों की अपेक्षा कुआं, बावली या तालाब आदि अच्छे होते है और कूपादि की अपेक्षा कुरुक्षेत्रादि तीर्थ, अयोध्या आदि पुरियां और काशी की पांचों नदियां एक-से-एक अधिक उत्तम हैं। ध्यान रहे कि स्नान के समय जलाशय में प्रवेश करने के पहले हाथ-पांव और मैल अलग धो लें। आचमन करके चोटी बांध लें और जल-कुश से संकल्प करके स्नान करें।

 

संकल्प में कुशा लेने के लिए अंगिरा ने लिखा है कि ‘विना दर्भैश्च यत् स्नानं यच्च दानं विनोदकम्। असंख्यातं च यज्जप्तं तत् सर्वं निष्फलं भवेत्।।’

 

स्नान में कुशा, दान में संकल्प का जल और जप में संख्या न हो तो ये सब फलदायक नहीं होते। …यह लिखने की आवश्यकता नहीं कि धर्मप्राण भारत के बड़े-बड़े नगरों, शहरों या गांवों में ही नहीं, छोटे-छोटे टोले तक में भी अनेक नर-नारी (विशेषकर स्त्रियां) बड़े सबेरे उठकर कार्तिक स्नान करतीं, भगवान् के भजन गातीं और एकभुक्त, एकग्रास, ग्रास-वृद्धि, नक्तव्रत या निराहारादि व्रत करती हैं और रात्रि के समय देव मन्दिरों, चौराहों, गलियों, तुलसी के बिरवों, पीपल के वृक्षों और लोकोपयोगी स्थानों में दीपक जलातीं और लम्बे बांस में लालटेन बांधकर किसी ऊंचे स्थान में ‘आकाशी दीपक प्रकाशित करती हैं।

 

2. करकचतुर्थी (करवाचौथ) (वामनपुराण)- यह व्रत कार्तिक कृष्ण की चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है। यदि वह दो दिन चन्द्रोदयव्यापिनी हो या दोनों ही दिन न हो तो ‘मातृविद्धा प्रशस्यते’ के अनुसार पूर्वविद्धा लेना चाहिए। इस वत में शिव-शिवा, स्वामिकार्तिक और चन्द्रमा का पूजन करना चाहिए और नैवेद्य में (काली मिट्टी के कच्चे करवे में चीनी की चासनी ढालकर बनाए हुए) करवे या घी में सेंके हुए और खांड मिले हुए आटे के लड्डू अर्पण करने चाहिए। इस व्रत को विशेषकर सौभाग्यवती स्त्रियां अथवा उसी वर्ष में विवाही हुई लड़कियां करती हैं और नैवेद्य के 13 करवे या लड्डू और 1 लोटा, 1 वस्त्र और 1 विशेष करवा पति के माता-पिता को देती हैं।

 

व्रती को चाहिए कि उस दिन प्रात: स्नानादि नित्य कर्म करके ‘मम सुखसौभाग्यपुत्रपौत्रादिसुस्थिरश्रीप्राप्तये करक- चतुर्थीव्रतमहं करिष्ये’ यह संकल्प करके बालू (सफेद मिट्टी) की वेदी पर पीपल का वृक्ष लिखें और उसके नीचे शिव-शिवा और षण्मुख की मूर्ति अथवा चित्र स्थापन करके ‘नम: शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संततिं शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे।।’ से शिवा (पार्वती) का षोडशोपचार पूजन करें और ‘नम: शिवाय’ से शिव तथा षण्मुखाय नम:’ से स्वामिकार्तिक का पूजन करके नैवेद्य का पक्वान्न (करवे) और दक्षिणा ब्राह्मण को देकर चन्द्रमा को अर्घ्य दें और फिर भोजन करें।

 

इसकी कथा का सार यह है कि- ‘शाकप्रस्थपुर के वेदधर्मा ब्राह्मण की विवाहिता पुत्री वीरवती ने करकचतुर्थी का व्रत किया था। नियम यह था कि चन्द्रोदय के बाद भोजन करे। परंतु उससे भूख नहीं सही गई और वह व्याकुल हो गई। तब उसके भाई ने पीपल की आड़ में महताब (आतिशबाजी) आदि का सुन्दर प्रकाश फैलाकर चन्द्रोदय दिखा दिया और वीरवती को भोजन करवा दिया। परिणाम यह हुआ कि उसका पति तत्काल अलक्षित हो गया और वीरवती ने बारह महीने तक प्रत्येक चतुर्थी का व्रत किया तब पुन: प्राप्त हुआ।

 

3. दशरथपूजा (संवत्सरप्रदीप)- कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को दशरथजी का पूजन करें और उनके समीप में दुर्गा का पूजन करें तो सब प्रकार के सुख उपलब्ध होते हैं।

 

4. दम्पत्यष्टमी (हेमाद्रि)- पुत्र की कामना वाले स्त्री-पुरुषों को चाहिए कि वे कार्तिक कृष्णाष्टमी को डाभ की पार्वती और शिव बनाकर उनका स्नान, गन्ध, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य से पूजन करें और उनके समीप में ब्राह्मण का पूजन करके उसे दक्षिणा दें। ऐसा करने से पुत्र की प्राप्ति होती है। इस व्रत में चन्द्रोदयव्यापिनी तिथि लेनी चाहिए। यदि वह दो दिन हो या दोनों ही दिन न हो तो दूसरे दिन व्रत करना चाहिए।

 

5. कृष्णैकादशी (ब्रह्मवैवर्त)- कार्तिक कृष्ण की एकादशी का नाम ‘रमा’ है। इसका व्रत करने से सब पापों का क्षय होता है। इसकी कथा का सार यह है कि- ‘प्राचीन काल में मुचुकुन्द नाम का राजा बड़ा धर्मात्मा था। उसके इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर और विभीषण जैसे मित्र और चन्द्रभागा- जैसी पुत्री थी। उसका विवाह दूसरे राज्य के शोभन के साथ हुआ था। विवाह के बाद वह ससुराल गई तो उसने देखा कि वहां का राजा एकादशी का व्रत करवाने के लिए ढोल बजवाकर ढिंढोरा पिटवाता है और उससे उसका पति सूखता है। यह देखकर चन्द्रभागा ने अपने पति को समझाया कि ‘इसमें कौन-सी बड़ी बात है। हमारे यहां तो हाथी, घोड़े, गाय, बैल, भैंस, बकरी और भेड़ तक को एकादशी करनी पड़ती है और एतन्निमित्त उस दिन उनको चारा-दाना तक नहीं दिया जाता। यह सुनकर शोभन ने व्रत कर लिया।

 

6. गोवत्सद्वादशी (मदनरत्नान्तर्गत भविष्योत्तरपुराण)- यह व्रत कार्तिक कृष्ण द्वादशी को किया जाता है। इसमें प्रदोषव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो ‘वत्सपूजा वटश्चैव कर्तव्यौ प्रथमेऽहनि’ के अनुसार पहले दिन व्रत करना चाहिए। उस दिन सायंकाल के समय गायें चरकर वापस आएं तब तुल्य वर्ण की गौ और बछड़े का गन्धादि से पूजन करके ‘क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते। सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते।।’ से उसके (आगे) चरणों में अर्घ्य दे और ‘सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते। मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि।’ से प्रार्थना करें। इस बात का स्मरण रखें कि उस दिन के भोजन के पदार्थों में गाय का दूध, दही, घी, छाछ और खीर तथा तेल के पके हुए भुजिया पकौड़ी या अन्य कोई पदार्थ न हों।

 

7. नीराजनद्वादशी (भविष्योत्तर)- कार्तिक कृष्ण द्वादशी को प्रात: स्नान से निवृत्त होकर कांसे आदि के उज्ज्वल पात्र में गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल का पात्र रखकर देवता, ब्राह्मण, गुरुजन (बड़े-बूढ़े), माता और घोड़े आदि का नीराजन (आरती) करें तो अक्षय फल होता है। यह नीराजन पांच दिन तक किया जाता है।

8. यम-दीपदान (स्कन्दपुराण)- कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को सायंकाल के समय किसी पात्र में मिट्टी के दीपक रखकर उन्हें तिल के तेल से पूर्ण करें। उनमें नवीन रूई की बत्ती रखें और उनको प्रकाशित करके गन्धादि से पूजन करें। फिर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके ‘मृत्युना दण्डपाशाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतां मम।।’ से दीपों का दान करें तो उससे यमराज प्रसन्न होते हैं। यह त्रयोदशी प्रदोषव्यापिनी शुभ होती है। यदि वह दो दिन हो या न हो तो दूसरे दिन करें।

 

9. धनत्रयोदशी (व्रतोत्सव) कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को सायंकाल के समय एक दीपक को तेल से भरकर प्रज्वलित करें और गन्धादि से पूजन करके अपने मकान के द्वार देश में अन्न की ढेरी पर रखें। स्मरण रहे वह दीप रातभर जलते रहना चाहिए, बुझना नहीं चाहिए।

 

10. गोत्रिरात्र (स्कन्दपुराण)- यह व्रत कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से दीपावली के दिन तक किया जाता है। इसमें उदयव्यापिनी तिथि ली जाती है। यदि वह 2 दिन हो तो पहले दिन व्रत करें। इस व्रत के लिए गोशाला या गायों के आने-जाने के मार्ग में 8 हाथ लम्बी और 4 हाथ चौड़ी वेदी बनाकर उस पर सर्वतोभद्र लिखें और उसके ऊपर छत्र के आकार का वृक्ष बनाकर उसमें विविध प्रकार के फल, पुष्प और पक्षी बनाएं।

 

वृक्ष के नीचे मण्डल के मध्य भाग में गोवर्द्धन भगवान्‌ की; उनके वाम भाग में रुक्मिणी, मित्रविन्दा, शैब्या और जाम्बवती की; दक्षिण भाग में सत्यभामा, लक्ष्मणा, सुदेवा और नाग्नजिति की; उनके अग्र भाग में नन्द बाबा, पृष्ठ भाग में बलभद्र और यशोदा तथा कृष्ण के सामने सुरभी, सुनन्दा, सुभद्रा और कामधेनु गौ- इनकी सुवर्णमयी 16 मूर्तियां स्थापित करें।

 

उन सबका नाम मन्त्र (यथा- गोवर्द्धनाय नम: आदि)- से पूजन करके ‘गवामाधार गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो। गोपगोपीसमोपेत गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते।’ से भगवान् को और ‘रुद्राणां चैव या माता वसूनां दुहिता च या। आदित्यानां च भगिनी सा नः शान्तिं प्रयच्छतु।।’ से गौ को अर्घ्य दे एवं ‘सुरभी वैष्णवी माता नित्यं विष्णुपदे स्थिता। प्रतिगृह्णातु मे ग्रासं सुरभी मे प्रसीदतु।।’ से गौ को ग्रास दें।

 

इस प्रकार विविध भांति के फल, पुष्प, पकवान्न और रसादि से पूजन करके बांस के पात्रों में सप्तधान्य और 7 मिठाई भरकर सौभाग्यवती स्त्रियों को दें। इस प्रकार 3 दिन व्रत करें और चौथे दिन प्रात: स्नानादि करके गायत्री के मन्त्र से तिलों की 108 आहुति देकर व्रत का विसर्जन करें तो इससे सुत, सुख और सम्पत्ति का लाभ होता है।

 

11. रूपचतुर्दशी (बहुसम्मत)- कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि के अन्त में- जिस दिन चन्द्रोदय के समय चतुर्दशी हो उस दिन प्रभात समय में दंतधावन आदि करके ‘यमलोकदर्शनाभावकामोऽभ्यंगस्नानंकरिष्ये।’ यह संकल्प करें और शरीर में तिल के तेल आदि का उबटन या मर्दन करके हल से उखड़ी हुई मिट्टी का ढेला, तुम्बी और अपामार्ग (ऊंगा)- इनको मस्तक के ऊपर बार-बार घुमाकर शुद्ध स्नान करें।

 

यद्यपि कार्तिक स्नान करने वालों के लिये ‘तैलाभ्यंग तथा शय्यां परान्नं कांस्यभोजनम् कार्तिके वर्जयेद् यस्तु परिपूर्णवती भवेत्।।’ के अनुसार तैलाभ्यं वर्जित किया है, किंतु ‘नरकस्य चतुर्दश्यां तैलाभ्यंगं च कारयेत्। अन्यत्र कार्तिकस्नायी तैलाभ्यंगं विवर्जयेत्।।’ के आदेश से नरक चतुर्दशी या (रूप चतुर्दशी) को तैलाभ्यंग करने में कोई दोष नहीं। यदि रूप चतुर्दशी दो दिन चन्द्रोदयव्यापिनी हो तो चतुर्दशी के चौथे प्रहर में स्नान करना चाहिये। इस व्रत को चार दिन तक करें तो सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है।

 

12. हनुमज्जन्म-महोत्सव (व्रतरत्नाकर)- ‘आश्विनस्यासिते पक्षे भूतायां व महानिशि। भौमवारेऽञ्जनादेवी हनूमन्तमजीजनत्।।’ अमान्त आश्विन (कार्तिक) कृष्ण चतुर्दशी भौमवार की महानिशा (अर्धरात्रि)- में अंजना देवी के उदर से हनुमानजी का जन्म हुआ था। अत: हनुमद्-उपासकों को चाहिए कि वे इस दिन प्रात: स्नानादि करके ‘मम शौर्योदार्यधैर्यादिवृद्ध्यर्थं हनुमत्प्रीतिकामनया हनुमज्जयन्तीमहोत्सवं करिष्ये’ यह संकल्प करके हनुमान् जी का यथाविधि षोडशोपचार पूजन करें।

 

पूजन के उपचारों में गन्धपूर्ण तेल में सिन्दूर मिलाकर उससे मूर्ति को चर्चित करें। पुन्नाम (पुरुष नाम के हजारा-गुलहजारा आदि)- के पुष्प चढ़ाएं और नैवेद्य में घृतपूर्ण चूरमा या घी में सेंके हुए और शर्करा मिले हुए आटे का मोदक और केला, अमरूद आदि फल अर्पण करके वाल्मीकीय रामायण के सुन्दरकाण्ड का पाठ करें।

 

रात्रि के समय घृतपूर्ण दीपकों की दीपावली का प्रदर्शन कराएं। यद्यपि अधिकांश उपासक इसी दिन हनुज्जयन्ती मनाते हैं और व्रत करते हैं, परन्तु शास्त्रान्तर में चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हनुज्जन्म का उल्लेख किया है; अत: इसका चैत्र को व्रतों भी वर्णन मिलेगा और हनुमान् जी का पूजाविधान होगा।’

 

…कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमज्जयन्ती मनाने का यह कारण है कि लंका विजय के बाद श्रीराम अयोध्या आए। पीछे भगवान् रामचन्द्रजी ने और भगवती जानकीजी ने वानरादि को विदा करते समय यथायोग्य पारितोषिक दिया था। उस समय इसी दिन (का० कृ० 14 को) सीताजी ने हनुमान् जी को पहले तो अपने गले की माला पहनाई (जिसमें बड़े-बड़े बहुमूल्य मोती और अनेक रत्न थे), परंतु उसमें राम-नाम न होने से हनुमान् जी उससे संतुष्ट न हुए। तब सीताजी ने अपने ललाट पर लगा हुआ सौभाग्य द्रव्य ‘सिंदूर’ प्रदान किया और कहा कि ‘इससे बढ़कर मेरे पास अधिक महत्व की कोई वस्तु नहीं है, अतएव तुम इसको हर्ष के साथ धारण करो और सदैव अजरामर रहो। यही कारण है कि कार्तिक कृष्ण 14 को हनुमज्जन्म महोत्सव मनाया जाता है और तेल-सिंदूर चढ़ाया जाता है।

13. यम-तर्पण (कृत्यतत्त्वार्णव)- इसी दिन (का० कृ० 14 को) सायंकाल के समय दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जल, तिल और कुश लेकर देवतीर्थ से ‘यमाय धर्मराजाय मृत्यवे अनन्ताय वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने वृकोदराय चित्राय और चित्रगुप्ताय।’ इनमें से प्रत्येक नाम का ‘नम:’ सहित उच्चारण करके जल छोड़ें। यज्ञोपवीत को कण्ठी की तरह रखें और काले तथा सफेद दोनों प्रकार के तिलों को काम में लें। कारण यह है कि यम में धर्मराज के रूप से देवत्व और यमराज के रूप से पितृत्व- ये दोनों अंश विद्यमान हैं।

 

14. दीपदान (कृत्यचन्द्रिका) इसी दिन प्रदोष के समय तिल-तेल से भरे हुए प्रज्वलित और सुपूजित 14 दीपक लेकर ‘यममार्गान्धकारनिवारणार्थे चतुर्दशदीपानां दानं करिष्ये।’ से संकल्प करके ब्रह्मा, विष्णु और महेशादि के मन्दिर, मठ, परकोटा, बाग-बगीचे, बावली, गली, कूचे, नजरनिवास (हमेशा निगाह में आने वाले बाग), घुड़शाला तथा अन्य सूने स्थानों में भी यथाविभाग दीपस्थापन करें। इस प्रकार के दीपकों से यमराज संतुष्ट होते हैं।

 

15. नरक चतुर्दशी (लिंगपुराण)- यह भी इसी दिन होती है। इसके निमित्त 4 बत्तियों के दीपक को प्रज्वलित करके पूर्वाभिमुख होकर ‘दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया। चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये।।’ इसका उच्चारण करके दान करें। इस अवसर में (आतिशबाजी आदि की बनी हुई) प्रज्वलित उल्का लेकर ‘अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धा: कुले मम। उज्ज्वलज्योतिषा दग्धास्ते यान्तु परमां गतिम्।।’ से उसका दान करें तो उल्का आदि से मरे हुए मनुष्यों की सद्गति हो जाती है।

 

16. कार्तिकी अमावस्या (भविष्योत्तर)- इस दिन प्रात: स्नानादि करने के अनन्तर देव, पितृ और पूज्यजनों का अर्चन करें और दूध, दही तथा घी आदि से श्राद्ध करके अपराह्न के समय नगर, गांव या बस्ती के प्राय: सभी मकानों को स्वच्छ और सुशोभित करके विविध प्रकार के गायन, वादन, नर्तन और संकीर्तन करें और प्रदोषकाल में दीपावली सजाकर मित्र, स्वजन या सम्बन्धियों सहित आधी रात के समय सम्पूर्ण दृश्यों का निरीक्षण करें। उसके बाद रात्रि के शेष भाग में सूप (छाजला) और डिंडिम (डमरू) आदि को वेग से बजाकर अलक्ष्मी को निकालें।

 

17. कौमुदी महोत्सव (हेमाद्रि)- उपर्युक्त प्रकार से हृष्ट-पुष्ट और संतुष्ट होकर दीपक जलाने आदि से कौमुदी महोत्सव सम्पन्न होता है। वह्निपुराण के लेखानुसार यह व्रत कार्तिक कृष्ण एकादशी से आरम्भ होकर अमावस्या तक किया जाता है।

 

18. दीपावली (व्रतोत्सव)- लोक प्रसिद्धि में प्रज्वलित दीपकों की पंक्ति लगा देने से ‘दीपावली’ और स्थान-स्थान में मण्डल बना देने से ‘दीपमालिका’ बनती है, अत: इस रूप में ये दोनों नाम सार्थक हो जाते हैं। इस प्रकार की दीपावली या दीपमालिका सम्पन्न करने से ‘कार्तिके मास्यमावास्या

 

तस्यां दीपप्रदीपनम्। शालायां ब्राह्मण: कुर्यात् स गच्छेत् परमं पदम्।।’ के अनुसार परमपद प्राप्त होता है। ब्रह्मपुराण में लिखा है कि ‘कार्तिक की अमावस्या को अर्धरात्रि के समय लक्ष्मी महारानी सद्गृहस्थों के मकानों में जहां-तहां विचरण करती हैं। इसलिये अपने मकानों को सब प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित करके दीपावली अथवा दीपमालिका बनाने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उनमें स्थायी रूप से निवास करती हैं।

 

इसके सिवा वर्षांकाल के किए हुए दुष्कर्म (जाले, मकड़ी, धूल-धमासे और दुर्गन्ध आदि) दूर करने के हेतु से भी कार्तिकी अमावस्या को दीपावली लगाना हितकारी होता है। यह अमावस्या प्रदोषकाल से आधी रात तक रहने वाली श्रेष्ठ होती है। यदि वह आधी रात तक रहे तो प्रदोषव्यापिनी लेना चाहिए।

 

19. लक्ष्मीपूजन- कार्तिक कृष्ण अमावस्या (दीपावली के दिन) प्रात: स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर ‘मम सर्वापच्छान्ति- पूर्वकदीर्घायुष्यबलपुष्टिनैरुज्यादिसकलशुभफलप्राप्त्यर्थं गजतुरगरथराज्यैश्वर्यादिसकलसम्पदामुत्तरोत्तराभिवृद्ध्यर्थम् इन्द्रकुबेरसहित श्रीलक्ष्मीपूजनं करिष्ये।’ यह संकल्प करके दिनभर व्रत रखें और सायंकाल के समय पुन: स्नान करके पूर्वोक्त प्रकार की ‘दीपावली’, ‘दीपमालिका’ और ‘दीपवृक्ष’ आदि बनाकर कोशागार (खजाने)- में या किसी भी शुद्ध, सुन्दर, सुशोभित और शान्तिवर्द्धक स्थान में वेदी बनाकर या चौकी-पाटे आदि पर अक्षतादि से अष्टदल लिखें और उस पर लक्ष्मी का स्थापन करके ‘लक्ष्म्यै नम:’, ‘इन्द्राय नम:’ और ‘कुबेराय नम:- इन नामों से तीनों का पृथक्-पृथक् (या एकत्र) यथाविधि पूजन करके ‘नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरे प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात्।। से लक्ष्मी की; ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तो महाबल:। शतयज्ञाधिपो देवस्तस्मा इन्द्राय ते नम:।।’ से ‘इन्द्र’ की और ‘धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय च। भवन्तु त्वत्प्रसादान्मे धनधान्यादिसम्पद:।।’ से ‘कुबेर’ की प्रार्थना करें।

 

पूजन सामग्री में अनेक प्रकार की उत्तमोत्तम मिठाई, उत्तमोत्तम फल-पुष्प और सुगन्धपूर्ण धूप-दीपादि लें और ब्रह्मचर्य से रहकर उपवास अथवा नक्तव्रत करें।