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देव उठनी एकादशी विशेष: श्रीविष्णु और तुलसी जी की आरती, स्तोत्र, चालीसा और स्तुति एक साथ

 

dev uthni ekadashi 2023 : हिंदू धर्म में देव उठनी एकादशी का खास महत्व है। इसे देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु तथा तुलसी माता का पूजन किया जाता हैं। इस दिन उनके मंत्र, स्तुति, स्तोत्र, चालीसा आदि का पाठ पढ़ने से श्रीहरि विष्णु प्रसन्न होकर भक्तों पर अपनी विशेष कृपा बरसाते हैं। 

 

यहां पढ़ें विशेष सामग्री एक साथ- 

 

भगवान विष्णु के शुभ मंत्र-Vishnu Mantra 

 

देव प्रबोधन मंत्र- 

ब्रह्मेन्द्ररुदाग्नि कुबेर सूर्यसोमादिभिर्वन्दित वंदनीय,

बुध्यस्य देवेश जगन्निवास मंत्र प्रभावेण सुखेन देव।

देवोत्थान स्तुति मंत्र-

उदितष्ठोतिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते,

त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्‌।

उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव॥

खास मंत्र- 

– ॐ विष्णवे नम:

– ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

– ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:

– ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।

– ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

– श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।

तुलसी माता स्तुति मंत्र-

देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः, 

नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।।

तुलसी तोड़ने के मंत्र-  

– मातस्तुलसि गोविन्द हृदयानन्द कारिणी 

नारायणस्य पूजार्थं चिनोमि त्वां नमोस्तुते ।।

– ॐ सुभद्राय नमः

-ॐ सुप्रभाय नमः

 

जल चढ़ाने का मंत्र- 

महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी

आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।।

तुलसी पूजा मंत्र- 

तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी। धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।। 

लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्। तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।।

तुलसी नामाष्टक- 

वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।

एतनामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम। य: पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।।

विष्णु चालीसा-Vishnu Chalisa

 

दोहा

 

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।

कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।

 

चौपाई

 

नमो विष्णु भगवान खरारी।

कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

 

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।

त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

 

सुन्दर रूप मनोहर सूरत।

सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

 

तन पर पीतांबर अति सोहत।

बैजन्ती माला मन मोहत॥

 

शंख चक्र कर गदा बिराजे।

देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

 

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।

काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

 

संतभक्त सज्जन मनरंजन।

दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

 

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।

दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

 

पाप काट भव सिंधु उतारण।

कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

 

करत अनेक रूप प्रभु धारण।

केवल आप भक्ति के कारण॥

 

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।

तब तुम रूप राम का धारा॥

 

भार उतार असुर दल मारा।

रावण आदिक को संहारा॥

 

आप वराह रूप बनाया।

हरण्याक्ष को मार गिराया॥

 

धर मत्स्य तन सिंधु बनाया।

चौदह रतनन को निकलाया॥

 

अमिलख असुरन द्वंद मचाया।

रूप मोहनी आप दिखाया॥

 

देवन को अमृत पान कराया।

असुरन को छवि से बहलाया॥

 

कूर्म रूप धर सिंधु मझाया।

मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥

 

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।

भस्मासुर को रूप दिखाया॥

 

वेदन को जब असुर डुबाया।

कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥

 

मोहित बनकर खलहि नचाया।

उसही कर से भस्म कराया॥

 

असुर जलंधर अति बलदाई।

शंकर से उन कीन्ह लडाई॥

 

हार पार शिव सकल बनाई।

कीन सती से छल खल जाई॥

 

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।

बतलाई सब विपत कहानी॥

 

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।

वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

 

देखत तीन दनुज शैतानी।

वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

 

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।

हना असुर उर शिव शैतानी॥

 

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे।

हिरणाकुश आदिक खल मारे॥

 

गणिका और अजामिल तारे।

बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

 

हरहु सकल संताप हमारे।

कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

 

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे।

दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

 

चहत आपका सेवक दर्शन।

करहु दया अपनी मधुसूदन॥

 

जानूं नहीं योग्य जप पूजन।

होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

 

शीलदया सन्तोष सुलक्षण।

विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

 

करहुं आपका किस विधि पूजन।

कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

 

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण।

कौन भांति मैं करहु समर्पण॥

 

सुर मुनि करत सदा सेवकाई।

हर्षित रहत परम गति पाई॥

 

दीन दुखिन पर सदा सहाई।

निज जन जान लेव अपनाई॥

 

पाप दोष संताप नशाओ।

भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

 

सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ।

निज चरनन का दास बनाओ॥

 

निगम सदा ये विनय सुनावै।

पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

विष्णु स्तुति-Shree Vishnu Stuti

 

शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं

विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्ण शुभांगम्।

लक्ष्मीकांत कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं

वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्व लौकेक नाथम्।।

 

यं ब्रह्मा वरुणैन्द्रु रुद्रमरुत: स्तुन्वानि दिव्यै स्तवैवेदे:।

सांग पदक्रमोपनिषदै गार्यन्ति यं सामगा:।

ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यति यं योगिनो

यस्यातं न विदु: सुरासुरगणा दैवाय तस्मै नम:।।

विष्णु जी की आरती-Vishnu ji ki aarti 

 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

 

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

 

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

 

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

 

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

 

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

 

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

तुलसी माता की आरती-Tulsi Mata Aarti

 

जय जय तुलसी माता

सब जग की सुख दाता, वर दाता

जय जय तुलसी माता ।।

 

सब योगों के ऊपर, सब रोगों के ऊपर

रुज से रक्षा करके भव त्राता

जय जय तुलसी माता।।

 

बटु पुत्री हे श्यामा, सुर बल्ली हे ग्राम्या

विष्णु प्रिये जो तुमको सेवे, सो नर तर जाता

जय जय तुलसी माता ।।

 

हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वन्दित

पतित जनो की तारिणी विख्याता

जय जय तुलसी माता ।।

 

लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में

मानवलोक तुम्ही से सुख संपति पाता

जय जय तुलसी माता ।।

 

हरि को तुम अति प्यारी, श्यामवरण तुम्हारी

प्रेम अजब हैं उनका तुमसे कैसा नाता

जय जय तुलसी माता ।।

श्री तुलसी चालीसा-Shri Tulsi Chalisa

 

।। दोहा ।।

 

जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी।

नमो नमो हरी प्रेयसी श्री वृंदा गुन खानी।।

श्री हरी शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब।

जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ।।

 

।। चौपाई ।।

 

धन्य धन्य श्री तलसी माता । महिमा अगम सदा श्रुति गाता ।।

हरी के प्राणहु से तुम प्यारी । हरीहीं हेतु कीन्हो ताप भारी।।

जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो । तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ।।

हे भगवंत कंत मम होहू । दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ।।

सुनी लख्मी तुलसी की बानी । दीन्हो श्राप कध पर आनी ।।

उस अयोग्य वर मांगन हारी । होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ।।

सुनी तुलसी हीं श्रप्यो तेहिं ठामा । करहु वास तुहू नीचन धामा ।।

दियो वचन हरी तब तत्काला । सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला।।

समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा । पुजिहौ आस वचन सत मोरा ।।

तब गोकुल मह गोप सुदामा । तासु भई तुलसी तू बामा ।।

कृष्ण रास लीला के माही । राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ।।

दियो श्राप तुलसिह तत्काला । नर लोकही तुम जन्महु बाला ।।

यो गोप वह दानव राजा । शंख चुड नामक शिर ताजा ।।

तुलसी भई तासु की नारी । परम सती गुण रूप अगारी ।।

अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ । कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ।।

वृंदा नाम भयो तुलसी को । असुर जलंधर नाम पति को ।।

करि अति द्वन्द अतुल बलधामा । लीन्हा शंकर से संग्राम ।।

जब निज सैन्य सहित शिव हारे । मरही न तब हर हरिही पुकारे ।।

पतिव्रता वृंदा थी नारी । कोऊ न सके पतिहि संहारी ।।

 

तब जलंधर ही भेष बनाई । वृंदा ढिग हरी पहुच्यो जाई ।।

शिव हित लही करि कपट प्रसंगा । कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ।।

भयो जलंधर कर संहारा। सुनी उर शोक उपारा ।।

तिही क्षण दियो कपट हरी टारी । लखी वृंदा दुःख गिरा उचारी ।।

जलंधर जस हत्यो अभीता । सोई रावन तस हरिही सीता ।।

 

अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा । धर्म खंडी मम पतिहि संहारा ।।

यही कारण लही श्राप हमारा । होवे तनु पाषाण तुम्हारा।।

सुनी हरी तुरतहि वचन उचारे । दियो श्राप बिना विचारे ।।

लख्यो न निज करतूती पति को । छलन चह्यो जब पारवती को ।।

जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा । जग मह तुलसी विटप अनूपा ।।

धग्व रूप हम शालिगरामा । नदी गण्डकी बीच ललामा ।।

जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं । सब सुख भोगी परम पद पईहै ।।

बिनु तुलसी हरी जलत शरीरा । अतिशय उठत शीश उर पीरा ।।

जो तुलसी दल हरी शिर धारत । सो सहस्त्र घट अमृत डारत ।।

तुलसी हरी मन रंजनी हारी। रोग दोष दुःख भंजनी हारी ।।

प्रेम सहित हरी भजन निरंतर । तुलसी राधा में नाही अंतर ।।

व्यंजन हो छप्पनहु प्रकारा । बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ।।

सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही । लहत मुक्ति जन संशय नाही ।।

कवि सुन्दर इक हरी गुण गावत । तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ।।

बसत निकट दुर्बासा धामा । जो प्रयास ते पूर्व ललामा ।।

पाठ करहि जो नित नर नारी । होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ।।

 

।। दोहा ।।

 

तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।

दीपदान करि पुत्र फल पावही बंध्यहु नारी ।।

सकल दुःख दरिद्र हरी हार ह्वै परम प्रसन्न ।

आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ।।

लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम।

जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ।।

तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम।

मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ।।

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